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श्रवण के बंशज सावधान

श्रवण के बंशज सावधान
संस्कृतियो के तुम स्वामी हो ।
मै विनत भाव कटिबद्ध खडा
तुम एकलव्य पथगामी हो ।।
जब अनाचार का भाव जगे
जब फैले मन में अधियारा ।
जब नागफनी हो कल्पवृक्ष 
तब गह लेता मन असिधारा ।।
पश्चिम -पूरब पर बढता है
नग्नता लिए वह चढता है ।
सब कुछ भौतिकता मे उलझी 
संकुचन भाव को गढता है ।।
मर्यादाओं का त्याग किये
जब त्याग भाव से डरता है ।
यह मेरा है यह मेरा है 
बस अपनी झोली भरता है ।।
तब दाग लगा जाता उन पर
पश्चिम ने घुटने टेके थे ।
इक सन्यासी विवेक ने तब
निज तप से जिनको फेके थे ।।
धोखा देना कब धर्म रहा
है त्याग भूमि भारत माता ।
लेना हमने कब सीखा है
केवल देना हमको आता ।।
डॉ दीनानाथ मिश्र

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3 Comments

लाजवाब

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Punam verma

13-Apr-2023 09:24 AM

Very nice

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